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विधानसभा चुनावों में मुस्लिम नेताओं को टिकट देने से बच रहीं पार्टियां!

भोपाल

तमाम राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों के कल्याण को लेकर बड़े-बड़े दावे और वादे करते हैं लेकिन जब राजनीति में उन्हें हिस्सेदारी देने की बात आती है तो चुप्पी छा जाती है। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी उक्त बात चरितार्थ होता दिख रहा है। सूबे में अब तक राजनीतिक दलों ने अपनी लिस्ट में कुछ नामों को छोड़कर मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को शामिल नहीं किया है। रविवार को घोषित कांग्रेस की 144 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में समुदाय से केवल एक उम्मीदवार है। वहीं भाजपा की अब तक की चार सूचियों के कुल 136 उम्मीदवारों में कोई भी मुस्लिम कंडिडेट नहीं है।

बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की अब तक घोषित सूची में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला है। बसपा ने 73 उम्मीदवारों में से एक मुस्लिम कंडिडेट को टिकट दिया है। आम आदमी पार्टी ने अपने 39 उम्मीदवारों में से दो मुस्लिम कंडिडेट को टिकट दिया है। वही सपा ने अपने नौ उम्मीदवारों में से किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है। राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों के अनुसार, राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 7 से 8 फीसदी है यानी सूबे में उनकी आबादी 50 से 60 लाख है। राज्य भर में दो दर्जन से अधिक सीटों पर उनकी निर्णायक मौजूदगी है।

सूबे की जिन विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की ठीक-ठाक मौजूदगी है उनमें भोपाल उत्तर, भोपाल मध्य, नरेला, जबलपुर उत्तर, जबलपुर पूर्व, बुरहानपुर, देवास, शाजापुर, उज्जैन उत्तर, ग्वालियर दक्षिण, इंदौर-1, इंदौर-3, देपालपुर, खंडवा, खरगोन, सागर, रतलाम शहर, सतना आदि शामिल हैं। जहां तक राज्य विधानसभा में समुदाय के प्रतिनिधित्व का सवाल है, साल 2018 के विधानसभा चुनावों में दो मुस्लिम उम्मीदवार- आरिफ अकील और आरिफ मसूद कांग्रेस के टिकट पर चुन कर आए थे। दोनों भोपाल शहर से हैं। किसी अन्य पार्टी से कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं चुना गया था।

एक समय मुस्लिमों की राज्य विधानसभा में अच्छी उपस्थिति थी। खासकर कांग्रेस उनको प्रमुखता से जगह देती थी। 1962 में मुस्लिम समुदाय से लगभग 7 विधायक चुने गए थे। इनमें से छह कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। साल 1967 में मुस्लिम विधायकों की संख्या घटकर 3 हो गई, लेकिन 1972 में बढ़कर 6 हो गई। अगले तीन चुनावों में मुस्लिम विधायकों की संख्या 3, 6 और 5 थी। हालांकि राम जन्म भूमि आंदोलन के बाद 1990 में यह संख्या घटकर 2 रह गई। 1993 के चुनावों में मुस्लिम समुदाय से कोई भी विधायक निर्वाचित नहीं हुआ। 

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राम जन्म भूमि आंदोलन के बाद, सूबे की विधानसभा में मुसलमानों की मौजूदगी कम होती जा रही है। यहां तक कि कांग्रेस भी मुस्लिम समुदाय के नेताओं को उम्मीदवार के रूप में उतारने से बचती नजर आ रही है। मुस्लिम विकास परिषद के मोहम्मद माहिर कहते हैं कि मध्य प्रदेश में मुस्लिम समुदाय के लिए समस्या अब यह है कि उसके पास ऐसे नेता नहीं हैं जिनका समुदाय पर कोई प्रभाव हो और जिनकी आवाज वास्तव में राजनीतिक दलों में सुनी जाती हो। 

साल 1998 और 2003 के चुनावों में मात्र दो-दो मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए थे। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें यह हाल तब है जब मुसलमानों की 47 निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छी मौजूदगी है। मुस्लिम लगभग 22 निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसकी एक वजह द्विध्रुवीय राजनीति (Bipolar Politics) भी है। मोहम्मद माहिर ने कहा- मुस्लिम नेता सूबे की की द्विध्रुवीय राजनीति के चक्रव्यूह में फंस गए हैं। साल 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता कमलनाथ ने कहा था कि यदि उन्हें 90 फीसदी मुसलमानों का समर्थन मिल जाए तो वह सरकार बना लेंगे। 

मुस्लिम विकास परिषद के मोहम्मद माहिर ने कहा कि कमलनाथ की अपील के बाद मुसलमानों ने भी कांग्रेस का समर्थन किया नतीजतन पार्टी ने महत्वपूर्ण 10 से 12 सीटों पर जीत दर्ज की। फिर भी इस समुदाय के नेताओं को कांग्रेस ने टिकट वितरण में खास तरजीह नहीं दी है। राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता कहते हैं कि सूबे में ऐसा माहौल है कि कोई भी मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर बहुसंख्यक मतों के खिसकने का जोखिम नहीं उठाना चाहता है। हालांकि राज्य कांग्रेस के प्रवक्ता जेपी धनोपिया ने कहा- कांग्रेस जाति या धर्म के आधार पर नहीं सोचती है। हम सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार का चयन करते हैं।

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